<?xml version="1.0" encoding="utf-8" ?>
<rss version="2.0" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" >
<channel>
<title>هفت خوان</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/</link>
<description>آشنایی با ادبیات ایران و جهان</description>
<language>fa</language>
<generator>blogfa.com</generator>
<lastBuildDate>Thu, 12 Nov 2009 09:49:28 GMT</lastBuildDate>
<item>
<title>به انگیزه ی زاد روز نیما یوشیج  زاده ۲۱ آبان ۱۲۷۴ آی آدمها</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-116.aspx</link>
<description>&lt;STRONG&gt;آی آدم ها که بر ساحل نشسته شاد و خندانید&lt;BR&gt;یک نفر در آب دارد می سپارد جان&lt;BR&gt;یک نفر دارد که دست و پای دائم می زند&lt;BR&gt;&lt;STRONG&gt;روی این دریای تند و تیره و سنگین که می دانید&lt;BR&gt;آن زمان که مست هستید از خیال دست یابیدن به دشمن&lt;BR&gt;آن زمان که پیش خود بیهوده پندارید&lt;BR&gt;که گرفتستید دست ناتوانی را&lt;BR&gt;تا توانایی بهتر را پدید آرید&lt;BR&gt;آن زمان که تنگ می بندید&lt;BR&gt;بر کمرهاتان کمربند&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;در چه هنگامی بگویم من&lt;BR&gt;یک نفر در آب دارد می کند بیهوده جان قربان&lt;BR&gt;آی آدمها که بر ساحل بساط دلگشا دارید&lt;BR&gt;نان به سفره جامه تان بر تن&lt;BR&gt;یک نفر در آب می خواند شما را&lt;BR&gt;موج سنگین را به دست خسته می کوبد&lt;BR&gt;باز می دارد دهان با چشم از وحشت دریده&lt;BR&gt;سایه هاتان را ز راه دور دیده&lt;BR&gt;آب را بلعیده در گود کبود و هر زمان بی تابیش افزون&lt;BR&gt;می کند زین آبها بیرون گاه سر گه پا&lt;BR&gt;آی آدم ها که روی ساحل آرام ، در کار تماشائید !&lt;BR&gt;موج می کوبد به روی ساحل خاموش&lt;BR&gt;پخش می گردد چنان مستی به جای افتاده ، بس مدهوش&lt;BR&gt;می رود نعره زنان. وین بانگ باز از دور می آید :&lt;BR&gt;” آی آدم ها .. “&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;و صدای باد هر دم دلگزاتر&lt;BR&gt;در صدای باد بانگ او رساتر&lt;BR&gt;از میان آبهای دور یا نزدیک&lt;BR&gt;باز در گوش این نداها&lt;BR&gt;” آی آدم ها… “&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;&lt;!--adcode--&gt;&lt;/STRONG&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;علی اسفندیاری&lt;/STRONG&gt; یا &lt;B&gt;علی نوری&lt;/B&gt; مشهور به &lt;B&gt;نیما یوشیج&lt;/B&gt; (زاده &lt;A title=&quot;۲۱ آبان&quot; href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%DB%B2%DB%B1_%D8%A2%D8%A8%D8%A7%D9%86&quot;&gt;۲۱ آبان&lt;/A&gt; &lt;A title=۱۲۷۴ href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%DB%B1%DB%B2%DB%B7%DB%B4&quot;&gt;۱۲۷۴&lt;/A&gt; &lt;SUP id=cite_ref-0 class=reference&gt;&lt;A href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%D9%86%DB%8C%D9%85%D8%A7_%DB%8C%D9%88%D8%B4%DB%8C%D8%AC#cite_note-0&quot;&gt;[۱]&lt;/A&gt;&lt;/SUP&gt; خورشيدی در دهکده &lt;A title=یوش href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%DB%8C%D9%88%D8%B4&quot;&gt;یوش&lt;/A&gt; استان &lt;A class=mw-redirect title=مازندران href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%D9%85%D8%A7%D8%B2%D9%86%D8%AF%D8%B1%D8%A7%D9%86&quot;&gt;مازندران&lt;/A&gt; - درگذشت &lt;A title=&quot;۱۳ دی&quot; href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%DB%B1%DB%B3_%D8%AF%DB%8C&quot;&gt;۱۳ دی&lt;/A&gt; &lt;A title=۱۳۳۸ href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%DB%B1%DB%B3%DB%B3%DB%B8&quot;&gt;۱۳۳۸&lt;/A&gt; &lt;SUP id=cite_ref-1 class=reference&gt;&lt;A href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%D9%86%DB%8C%D9%85%D8%A7_%DB%8C%D9%88%D8%B4%DB%8C%D8%AC#cite_note-1&quot;&gt;[۲]&lt;/A&gt;&lt;/SUP&gt; خورشیدی در &lt;A class=mw-redirect title=شمیران href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%D8%B4%D9%85%DB%8C%D8%B1%D8%A7%D9%86&quot;&gt;شمیران&lt;/A&gt; شهر &lt;A title=تهران href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%D8%AA%D9%87%D8%B1%D8%A7%D9%86&quot;&gt;تهران&lt;/A&gt;) شاعر معاصر ایرانی است. وی بنیانگذار &lt;A class=mw-redirect title=&quot;شعر نو&quot; href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%D8%B4%D8%B9%D8%B1_%D9%86%D9%88&quot;&gt;شعر نو فارسی&lt;/A&gt; است.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;نیما یوشیج با مجموعه تأثیرگذار &lt;A title=افسانه href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%D8%A7%D9%81%D8%B3%D8%A7%D9%86%D9%87&quot;&gt;افسانه&lt;/A&gt; که مانیفست &lt;A class=mw-redirect title=&quot;شعر نو&quot; href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%D8%B4%D8%B9%D8%B1_%D9%86%D9%88&quot;&gt;شعر نو فارسی&lt;/A&gt; بود، در فضای راکد شعر ایران انقلابی به پا کرد. نیما آگاهانه تمام بنیاد ها و ساختارهای شعر کهن فارسی را به چالش کشید. &lt;A class=mw-redirect title=&quot;شعر نو&quot; href=&quot;http://fa.wikipedia.org/wiki/%D8%B4%D8%B9%D8%B1_%D9%86%D9%88&quot;&gt;شعر نو&lt;/A&gt; عنوانی بود که خود نیما بر هنر خویش نهاده بود.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;تمام جریان‌های اصلی شعر معاصر فارسی مدیون این انقلاب و تحولی هستند که نیما مبدع آن بود.&lt;/P&gt;
&lt;H3 id=siteSub&gt;از ویکی‌پدیا، دانشنامهٔ آزاد&lt;/H3&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 09:49:28 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=116</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-116.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>احسان هم رفت ...</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-115.aspx</link>
<description>&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;چنان بد که هر شب دو مرد جوان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;چه کهتر چه از تخمهٔ پهلوان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;خورشگر ببردی به ایوان شاه&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;همی ساختی راه درمان شاه&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;بکشتی و مغزش بپرداختی&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;مران اژدها را خورش ساختی&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;دو پاکیزه از گوهر پادشا&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;دو مرد گرانمایه و پارسا&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;یکی نام ارمایل پاکدین&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;دگر نام گرمایل پیشبین&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;چنان بد که بودند روزی به هم&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;سخن رفت هر گونه از بیش و کم&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;ز بیدادگر شاه و ز لشکرش&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;وزان رسمهای بد اندر خورش&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;یکی گفت ما را به خوالیگری&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;بباید بر شاه رفت آوری&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;وزان پس یکی چاره‌ای ساختن&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;ز هر گونه اندیشه انداختن&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;مگر زین دو تن را که ریزند خون&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;یکی را توان آوریدن برون&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;برفتند و خوالیگری ساختند&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;خورشها و اندازه بشناختند&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;خورش خانهٔ پادشاه جهان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;گرفت آن دو بیدار دل در نهان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;چو آمد به هنگام خون ریختن&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;به شیرین روان اندر آویختن&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;ازان روز بانان مردم‌کشان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;گرفته دو مرد جوان راکشان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;زنان پیش خوالیگران تاختند&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;ز بالا به روی اندر انداختند&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;پر از درد خوالیگران را جگر&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;پر از خون دو دیده پر از کینه سر&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;همی بنگرید این بدان آن بدین&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;ز کردار بیداد شاه زمین&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;از آن دو یکی را بپرداختند&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;جزین چاره‌ای نیز نشناختند&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;برون کرد مغز سر گوسفند&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;بیامیخت با مغز آن ارجمند&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;یکی را به جان داد زنهار و گفت&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;نگر تا بیاری سر اندر نهفت&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;نگر تا نباشی به آباد شهر&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;ترا از جهان دشت و کوهست بهر&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;به جای سرش زان سری بی‌بها&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;خورش ساختند از پی اژدها&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;ازین گونه هر ماهیان سی‌جوان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;ازیشان همی یافتندی روان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;چو گرد آمدی مرد ازیشان دویست&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;بران سان که نشناختندی که کیست&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;خورشگر بدیشان بزی چند و میش&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;سپردی و صحرا نهادند پیش&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;کنون کرد از آن تخمه داد نژاد&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;که ز آباد ناید به دل برش یاد&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 08:25:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=115</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-115.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>مهدی سحابی هم از بین ما رفت</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-114.aspx</link>
<description>ایلنا: مهدی سحابی نقاش، مجسمه‌ساز، نویسنده، عکاس و مترجم ایرانی صبح امروز بر اثر ايست قلبي درگذشت . &lt;BR&gt;به گزارش ایلنا مهدی سحابی متولد ۱۳۲۳ در شهر قزوین نقاش، مجسمه‌ساز، نویسنده، عکاس و مترجم ایرانی است. عمده شهرت سحابی بابت ترجمه مجموعهٔ &lt;STRONG&gt;در جستجوی زمان از دست رفته&lt;/STRONG&gt; نوشته مارسل پروست است. &lt;BR&gt;سحابی در آغاز به تحصیل در هنرکده هنرهای تزیینی تهران و سپس فرهنگستان هنرهای زیبا ی رم مشغول شد، اما پس از مدتی هر دو را رها کرد. وی مدتی به سراغ روزنامه‌نگاری، بازیگری، عکاسی و کارهای مشابه پرداخت و در آخر به سراغ ادبیات، نقاشی و ترجمه ادبی رفت. وی آثاری را از زبان‌های انگلیسی، فرانسوی و ایتالیایی به فارسی برگردانده است و رمان عظیم مارسل پروست بی‌گمان مهم‌ترین ترجمه اوست. او دوره نقاشي و كارگرداني را نيمه تمام نهاد و به روزنامه‌نگاری روي آورد. &lt;BR&gt;ترجمه بارون درخت‌نشین ایتالو کالوینو مرگ قسطي اثر لويي فردينان سلين مونته دیدیو کوه خدا آری دلوکا و مادام بواري نوشته گوستاو فلوبر، از آثار معروف سحابي است. &lt;BR&gt;وی صبح امروز در اثر ایست قلبی در فرانسه در گذشت. ... و احسان فتاحیان را یاری کنیم &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;فردوسی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;زِدلها همه کینه بیــرون کنــید***به مهر اندرون کشور افسون کنید&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;زخون ریختن دست باید کشـید***ســــرِ بیــگنــاهـان نـباید بـریـد&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;همه ز آشتی کام مردم رواست***که نابود باد آنکه او جنگ خواست&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 10:19:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=114</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-114.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>سیزده آبان</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-113.aspx</link>
<description>&lt;FONT color=#00cc00 size=3&gt;آنك سیزده آبان سبزترین روز سال می آید &lt;FONT color=#ff9900&gt;آنهم در این خزان برگها.&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt; 
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Wed, 04 Nov 2009 12:55:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=113</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-113.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>ادبيات با حضور، يا بي حضور ما زنده خواهد ماند</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-112.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl ?&gt;&lt;STRONG&gt;خوب گویا به انگیزه ی یا بهانه ی زادروزم -نه آبان- هم که شده باید به روز کنم. قرار بود قسمتهایی از کتاب معرفی شده در پست پیش را بیاورم. البته کتاب در دسترس نیست به همین دلیل شماره ی ص را نمی توانم بنویسم. یکی از دوستان اصل مقالات انگلیسی را خواسته بود که من ندارم. این بخشها از ترجمه ی خودم است که در حقیقت باید در بدنه ی اصلی کتاب خوانده شوند چون پنج مقاله ی به هم پیوسته اند و اینجا تنها برای نمونه آورده ام:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;خواندن كتاب هاي كودكان را دوست دارم. هنگام كودكي اين كتاب ها برايم لذت بخش بودند و همين حقيقت كه در بزرگسالي نيز همچنان برايم لذت بخش مانده اند مرا به اين راه كشانيد كه در مقام پژوهنده اي ادبي كانون توجه خود را به آن ها معطوف كنم. فرض نخستين من اين است كه لذت من شايد بتواند سرچشمة ارزشمندي از بينش باشد و شايد درك بيشتر از اين نكته مرا در تعيين ويژگي هايي كه كتاب هاي كودكان را ـ همچون گونة نوشتاري متمايز و نوع ادبي ويژه ـ از ديگر كتاب ها جدا مي كنند، ياري رساند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;     آن دسته از كتاب هاي كودكان كه لذتي ويژه برايم به ارمغان آورده اند ـ متن هايي قديمي تر همچون  &lt;B&gt;داستان پيتر ربيت&lt;/B&gt; اثر بتريكس پاتر، &lt;B&gt;آنجا كه چيزهاي وحشي هستند&lt;/B&gt; اثر موريس سندك، &lt;B&gt;تار شارلوت&lt;/B&gt; اثر اي. بي. وايت و آثاري جديدتر مانند &lt;B&gt;ويتزي بت&lt;/B&gt; اثر فرانسسكا ليا بلاك، يا كتاب هاي تصويري كريس راشكا يا رمان هاي نويسندة كانادايي برايان دويل ـ هرچند به ظاهر كاملاً از هم متفاوتند، اما در دو چيز اشتراك دارند. نخست اين كه در ويژگي هاي غالباً مرتبط با متون  نوشته شده براي كودكان ـ همان ويژگي هايي كه در فصلي  از كتابم &lt;B&gt;لذت هاي ادبيات كودكان&lt;/B&gt; در اين باب  برشمرده ام - مشترك اند. كتاب هاي كودكان، دست كم در مقايسه با بسياري از متون ادبي بزرگسالان، كوتاه، ساده، غالباً با هدف آموزشي، و در نگرش نسبت به زندگي، به روشني مثبت انديش اند، يعني خوش بينانه اند و پاياني خوش دارند. اما نكتة دوم، آنچنان كه از بحث هاي انتقادي گسترده دربارة بسياري از اين متون برمي آيد، سادگي ظاهري آن ها در برگيرندة ژرفاهاست و اغلب، خوش بيني ظاهري آن ها نيز به گونه اي شگفت انگيز، با ويژگي هاي حاكي از بدبيني همراه است، يعني شرايطي كه با خطيري و دل انگيزي، نتايجي منفي و معكوس به بار مي آورند و پيام هاي ظاهري متن را به مقابله مي ايستند و تحليل مي برند. اين متون را مي توان به آساني و بي هيچ تلاشي خواند يا شنيد، اما هنگامي كه خوانده مي شوند، همچنان معنا و اهميت و پيچيدگي را مي پرورانند تا پژواك آن ها در درون و برون متن به صدا در آيد. اين ها، متوني پرطنين اند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;     آن ها را دوست دارم و بر اين باورم كه اين دوست داشتن&lt;I&gt; به دليل&lt;/I&gt; طنين انداز بودنشان است ـ زيرا با وجود سادگي، خود را به انديشة بسيار وامي نهند. در كار اين متون كه به ظاهر صريح و در عين حال غيرصريح اند، افسوني نهفته است. گاه متوني را مي يابم كه آشكارا پيچيده تر، اما افسونيشان كمتر است.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;پری نودلمن&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl ?&gt;
&lt;P dir=rtl ?&gt;&lt;STRONG&gt;ادبيات با حضور، يا بي حضور ما زنده خواهد ماند، اما اگر كمترين باوري به لذت هاي هوشياري داريم، كساني را كه به آنها درس مي دهيم، تشويق مي كنيم كه  نسبت به شيوه هاي خواندن و گسترة خوانش هاي موجود، هوشيار باشند. بياييد كتابخانه هايمان، برنامه هايِ درسيمان، دلبستگي هايمان، آكنده از ادبياتي باشد كه چندگانگيِ نژادي و فرهنگي را نشان مي دهد. بياييد تضادها را تدريس كنيم. بياييد تفاوت را بپذيريم، يا بهتر از آن، تشخيص دهيم. بياييد شالودة  ايدئولوژيكِ كتاب هايي را كه مي خوانيم و موضع هايي را كه هنگام خواندن مي گيريم، آشكار سازيم. كسي چه مي داند، شايد با تداوم رو در رو شدن با تناقض هاي درون خود و درون متن هايي كه مي خوانيم، خود را اندكي از فشارهاي ايدئولوژي برهانيم.&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl ?&gt;&lt;STRONG&gt;رادریک مکگیلیس&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl ?&gt;&lt;STRONG&gt;
&lt;META content=Word.Document name=ProgId&gt;
&lt;META content=&quot;Microsoft Word 11&quot; name=Generator&gt;
&lt;META content=&quot;Microsoft Word 11&quot; name=Originator&gt;&lt;LINK href=&quot;file:///C:\DOKUME~1\global\LOKALE~1\Temp\msohtml1\03\clip_filelist.xml&quot; rel=File-List&gt;
&lt;STYLE&gt;/*&lt;![CDATA[*/
&lt;!--
 /* Font Definitions */
 @font-face
	{font-family:&quot;Traditional Arabic&quot;;
	mso-font-alt:&quot;Times New Roman&quot;;
	mso-font-charset:178;
	mso-generic-font-family:auto;
	mso-font-pitch:variable;
	mso-font-signature:8193 0 0 0 64 0;}
@font-face
	{font-family:Nazanin;
	mso-font-alt:&quot;Courier New&quot;;
	mso-font-charset:178;
	mso-generic-font-family:auto;
	mso-font-pitch:variable;
	mso-font-signature:8193 0 0 0 64 0;}
@font-face
	{font-family:Yagut;
	mso-font-charset:178;
	mso-generic-font-family:auto;
	mso-font-pitch:variable;
	mso-font-signature:8193 0 0 0 64 0;}
 /* Style Definitions */
 p.MsoNormal, li.MsoNormal, div.MsoNormal
	{mso-style-parent:&quot;&quot;;
	margin:0cm;
	margin-bottom:.0001pt;
	text-align:right;
	mso-pagination:widow-orphan;
	direction:rtl;
	unicode-bidi:embed;
	font-size:10.0pt;
	mso-bidi-font-size:12.0pt;
	font-family:&quot;Times New Roman&quot;;
	mso-fareast-font-family:&quot;Times New Roman&quot;;
	mso-bidi-font-family:&quot;Traditional Arabic&quot;;}
p.MsoBodyText, li.MsoBodyText, div.MsoBodyText
	{margin:0cm;
	margin-bottom:.0001pt;
	text-align:justify;
	text-justify:kashida;
	text-kashida:0%;
	mso-pagination:widow-orphan;
	direction:rtl;
	unicode-bidi:embed;
	font-size:10.0pt;
	mso-bidi-font-size:12.0pt;
	font-family:&quot;Times New Roman&quot;;
	mso-fareast-font-family:&quot;Times New Roman&quot;;
	mso-bidi-font-family:Yagut;}
@page Section1
	{size:612.0pt 792.0pt;
	margin:70.85pt 70.85pt 2.0cm 70.85pt;
	mso-header-margin:36.0pt;
	mso-footer-margin:36.0pt;
	mso-paper-source:0;}
div.Section1
	{page:Section1;}
--&gt;
/*]]&gt;*/&lt;/STYLE&gt;
&lt;/STRONG&gt;
&lt;P&gt; زيبايي شناسيِ نو در پايانِ سدة هيجدهم، و با انتشار كتاب نقد داوري اثرِ كانت زاده شد. اصطلاح زيبايي شناسيك، كه به لذت برآمده از آثار هنري اشاره دارد، در  [شناخت]  اين مفهوم كه آثار زباني بايد از گونه هايِ عملي تر، فايده باورانه تر، يا هدفمندترِ كاربردهاي زباني متمايز باشد، امري كاملاً مهم به شمار مي آمد. در حالي كه ادبيات - پيش از اين - به گونه هايِ بسياري از متون، از جمله خطابه ها و متون علمي اشاره مي كرد، اما نظريه پردازانِ بعد از كانت، برآن بودند كه كاربرد اين اصطلاح را به متوني محدود كنند كه با عبارت (زيبايي شناسيك) “هدفمنديِ بدون هدف” (تكيه كلام كانت) تعريف پذير بودند. براي نمونه، مي توان از يكي از مثال هاي صورتگرا و بصريِ كانت ياد كرد: لذتي كه از طرح خالكوبي بر مي آيد، ممكن است از ارزيابيِ ما از تأثيرِ بصري و فيزيكيِ آن بر بدن جدا باشد. در طول دو سدة گذشته،‌ لذتِ متون (گذشته از خالكوبي) به گونه اي دامنه دار توجه ما را - شايد هم به ويژه در حيطة ادبيات كودك -  به خود معطوف كرده است، كه تا حدي به سبب تصويري است كه رمانتيك ها از كودكي - همچون قلمرويي كه با رنگ و بويِ زرّينِ بازي معصومانه، از هدفمنديِ بزرگسال محفوظ مانده -  به وجود آوردند. اما اهميتِ آشكارِ آموزش گرايي در ادبيات كودك آن دوره آن را در هاله اي از ترديد فرو برد و در معرض بحث نهاد مبني بر اينكه: ادبيات كودك هدفي داشته است و از اين رو نمي توان آن را زيبايي شناسيك دانست.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;مارگارت هيگونه&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;دومين خط پژوهش كه دوست دارم دنبالة آن را – هر چند اين پيگيري به خاطر محدوديت فضا مختصر باشد - بگيرم از ملاحظة نودلمن در حوزة داستان كودك برمي آيد كه، “كتاب هايي كه بيشترين لذت را از آن ها مي برم دربارة دو تضاد هستند كه به روشني تعريف شده و روياروي هم قرارگرفته اند.” همانطور كه نودلمن با هوشياري بيان مي كند در بسياري از بهترين نمونه هاي داستان كودك، “كششي در سوهاي مختلف باقي مي ماند. كششي ميان لذت ندانستن و مهارت در يافتن ميزان نادانسته ها.” او اين كشش را به خصيصه اي مهم و اغلب ناديده گرفته شده از تجربة خواندن مربوط مي كند: “فكر مي كنم كه در بحث از لذت جنبه اي ديگر نيز در كار است: يعني شيوه اي كه مي گذارد به افراط در اجراي آييني حركت از كودكي به پختگي، و از معصوميت به دانش، به گونه اي مكرر وارد شويم. چنين حركتي در زندگي واقعي تنها يك بار براي ما روي مي دهد.” همانطور كه خواننده اي جوانتر يا پيرتر،  [خواندن]  متون كلاسيك مشخصي از داستان كودكان را مكرر تجربه مي كند، “پيري از پس جواني فرا مي رسد تنها براي آن كه ديگر بار جواني، افسون وار، از پس آن فرا رسد.” بازهم دوست دارم بگويم كه اين كشش هاي متناقض لزوماً به ادبيات كودك منحصر نمي شود. چنين پديده اي را بيش از پنجاه سال پيش، شاعر و منتقد و نويسندة داستان كودك برجسته اي، در سخنراني اي دربارة ساختار شعري توصيف كرده است؛ سخنراني اي كه مدتها فراموش شده  بود و من به تازگي در كشف دوباره و انتشار آن بختيار بودم. منظورم مقالة “سطوح وتضادها: ساختار و شعر،” است كه رندل جارل آن را در سال 1942 در دانشگاه پرينستون ارائه كرد و نخستين بار در مجلة&lt;STRONG&gt; جورجيا ريويو&lt;/STRONG&gt; منتشر شد.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;رابرت لوول، بعدها، پس از مرگ جارل در اداي دِيني شيوا، خاطرنشان كرد كه موضوع كليديِ اين دوست نزديك “كودكيِ خام و از دست رفتة او بود، كه تنها در خاطره و خيال مي شد به چنگش آورد. و مهمتر از همه كودكي! . . . براي جارل، كودكي نگاهي الهي بود كه گذرا بود، كه برآن بود در تمام طول زندگي با آن زيست، با درد و با ظرافت با آن دوباره زيست، دگرگونش كرد، باليده اش كرد – مرد همراهِ زن و رو در روي او، كودك همراهِ بزرگسال و رو در روي او” &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl ?&gt;&lt;STRONG&gt; تامس تراویسانو&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl ?&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl ?&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;BR&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl ?&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;BR&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Fri, 30 Oct 2009 17:27:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=112</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-112.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>اینترنت</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-111.aspx</link>
<description>بیش از &lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;یک ماه است که در خانه اینترنت ندارم و به روز کردن وبلاگ هم دردسر دارد. به زودی به روز خواهم کرد.&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Wed, 28 Oct 2009 10:21:20 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=111</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-111.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>دانشگاه و دیگرخوانیهای ناگزیر</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-110.aspx</link>
<description>&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt; در نظرهای مطلب قبل دوستان یادی از این دوست و معلم خودشان کرده بودند. بسیار &lt;/STRONG&gt; &lt;STRONG&gt;سپاسگزارم.&lt;/STRONG&gt; 
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;من هم دلم برای تدریس خیلی تنگ شده به خصوص &lt;FONT color=#000000&gt;ترجمه و نمایش نامه و بررسی آثار. ولی فعلا باید ساخت. اما خبر خوش -در میان این همه دود و درد و بی مهری - اینکه کتاب&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#000000&gt; &lt;FONT color=#ff0033&gt;دیگرخوانیهای ناگزیر&lt;/FONT&gt; از دکتر مرتضی خسرونژاد منتشر شد شامل دو درآمد -به شکل دو مقاله از پیتر هانت و مرتضی خسروتژاد- و  ۲۱  مقاله ی ترجمه  شده از اندیشمندان تئوری ادبیا&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;ت کودک &lt;FONT color=#000000&gt;جهان.&lt;/FONT&gt; این کتاب از آن کارهای ماندگار است که تکان بزرگی به حرکت ادبیات کودک ایران خواهد داد و برای دیگر علاقه مندان به ادبیات - نه لزوما&quot; ادبیات کودک- بسیار مفید است.&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;از این ۲۱ مقاله ۵ تا را من ترجمه کرده ام که قسمتهای کوتاهی را در آینده برای نمونه اینجا خواهم گذاشت. &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;یادداشت زیر از خبرگزاری مهر است که لینک آن در زیر آمده:&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;خبرگزاری مهر - گروه فرهنگ و ادب: &lt;/STRONG&gt;این کتاب شامل مقالات جمعی از برجسته‌ترین نظریه‌پردازان حوزه ادبیات کودک جهان در موضوع رویکردهای نقد و نظریه ادبیات کودک است که به فارسی ترجمه شده و در 10 فصل گرد آمده است&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;پیتر هانت، جان استیونز، رادریک مگیلیس، پری نودلمن، ژاکلین رز، ایدن چمبرز، گرت بی. متیوز، کارین لسنیک ابرشتاین، جک زایپس و ماریا نیکولایوا این نظریه‌پردازان را شامل می‌شوند.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;این کتاب همانگونه که از عنوان فرعی آن (رویکردهای نقد و نظریه ادبیات کودک) برمی‌آید، نخستین اثر تئوریک در این زمینه است که در مرکز مطالعات ادبیات کودک دانشگاه شیراز تدوین یافته و در انتخاب مقالات کتاب هم سعی شده رویکردهای مختلف به ادبیات کودک در جهان منعکس شود&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;علاوه بر مقدمه‌ای که پروفسور پیتر هانت بر این اثر نسبتاً حجیم نوشته، کتاب توسط &lt;IMG src=&quot;http://blogfa.com/images/smileys/02.gif&quot; height=18&gt;(=به قلم- شکل و کمانک را من افزوده ام) گروهی از اعضای هیئت علمی مرکز مطالعات ادبیات کودک دانشگاه شیراز شامل فریده پورگیو، الهام فروزنده، داوود خزایی، عبدالحسین پارسی، طاهره آدینه پور، روحیه نظیری پور، غزال بزرگمهر و اسماعیل حسینی، با سرپرستی مرتضی خسرونژاد ترجمه شده است.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;کتاب 736 صفحه‌ای &quot;دیگرخوانی‌های ناگزیر&quot; در شمارگان 3000 نسخه منتشر شده است.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;ناشر: انتشارات کانون پرورش فکری کودکان و نوجوانان &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;لینک&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;A href=&quot;http://www.mehrnews.com/fa/newsdetail.aspx?NewsID=956461&quot;&gt;http://www.mehrnews.com/fa/newsdetail.aspx?NewsID=956461&lt;/A&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;IMG src=&quot;http://www.mehrnews.com/mehr_media/image/2009/09/473059_orig.jpg&quot;&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 13 Oct 2009 04:23:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=110</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-110.aspx</guid>
</item>
<item>
<title> October 2, the birthday of Mahatma Gandhi</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-109.aspx</link>
<description>&lt;A href=&quot;http://www.google.de/search?q=Gandhi&amp;hl=de&amp;ct=gandhi09&amp;oi=ddle&quot;&gt;&lt;IMG id=logo title=&quot;Geburtstag von Mohandas Karamchand Gandhi&quot; height=127 alt=&quot;Geburtstag von Mohandas Karamchand Gandhi&quot; src=&quot;http://www.google.de/logos/gandhi09.gif&quot; width=325 onload=window.lol&amp;&amp;lol() border=0&gt;&lt;/A&gt; 
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=left&gt;&lt;STRONG&gt;The International Day of Non-Violence&lt;/STRONG&gt; is marked on 2 October,&lt;STRONG&gt; the birthday of Mahatma Gandhi&lt;/STRONG&gt;, leader of the Indian independence movement and pioneer of the philosophy and strategy of non-violence&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;According to General Assembly resolution A/RES/61/271 of 15 June 2007, which established the commemoration, the International Day is an occasion to &quot;disseminate the message of non-violence, including through education and public awareness&quot;. The resolution reaffirms &quot;the universal relevance of the principle of non-violence&quot; and the desire &quot;to secure a culture of peace, tolerance, understanding and non-violence&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;Introducing the resolution in the General Assembly on behalf of 140 co-sponsors, India’s Minister of State for External Affairs, Mr. Anand Sharma, said that the wide and diverse sponsorship of the resolution was a reflection of the universal respect for Mahatma Gandhi and of the enduring relevance of his philosophy. Quoting the late leader’s own words, he said: &quot;Non-violence is the greatest force at the disposal of mankind. It is mightier than the mightiest weapon of destruction devised by the ingenuity of man&quot;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;IMG height=224 alt=&apos;&quot;Non-violence&quot;, a sculpture by Karl Fredrik Reutersward, which sits outside UN Headquarters in New York.&apos; src=&quot;http://www.un.org/en/events/nonviolenceday/images/nonviolence_sculpture.jpg&quot; width=330&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &quot;Non-Violence&quot;, a sculpture by Karl Fredrik Reutersward, sits permanently outside UN Headquarters in New York.&lt;EM&gt;  UN Photo&lt;/EM&gt;&lt;/P&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;آسایش دو گیتی تفسیر این دو حرف است&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;با دوستان مروت با دشمنان مدارا&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Fri, 02 Oct 2009 15:10:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=109</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-109.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>خروشید کای پای مردان دیو/بریده دل از ترس گیهان خدیو</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-108.aspx</link>
<description>&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;از داستان ضحاک - فردوسی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;ضحاک:&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;یکی محضر اکنون بباید نوشت&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;که جز تخم نیکی سپهبد نکشت&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;نگوید سخن جز همه راستی&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;نخواهد به داد اندرون کاستی&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;زبیم سپهبد همه راستان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;برآن کار گشتند همداستان&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;بر آن محضر اژدها ناگزیر&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;گواهی نوشتند برنا و پیر&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;هم آنگه یکایک ز درگاه شاه&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;برآمد خروشیدن دادخواه&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;ستم دیده را پیش او خواندند&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;بر نامدارانش بنشاندند&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;بدو گفت مهتر بروی دژم&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;که بر گوی تا از که دیدی ستم&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;خروشید و زد دست بر سر ز شاه&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;که شاها منم کاوه‌ی دادخواه&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;یکی بی‌زیان مرد آهنگرم&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;ز شاه آتش آید همی بر سرم&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;تو شاهی و گر اژدها پیکری&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;بباید بدین داستان داوری&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;که گر هفت کشور به شاهی تراست&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;چرا رنج و سختی همه بهر ماست&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;شماریت با من بباید گرفت&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;بدان تا جهان ماند اندر شگفت&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;مگر کز شمار تو آید پدید&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;که نوبت ز گیتی به من چون رسید&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;که مارانت را مغز فرزند من&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;همی داد باید ز هر انجمن&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;سپهبد به گفتار او بنگرید&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;شگفت آمدش کان سخن‌ها شنید&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;بدو باز دادند فرزند او&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;به خوبی بجستند پیوند او&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;بفرمود پس کاوه را پادشا&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;که باشد بران محضر اندر گوا&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;چو بر خواند کاوه همه محضرش&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;سبک سوی پیران آن کشورش&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;خروشید کای پای مردان دیو&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;بریده دل از ترس گیهان خدیو&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;همه سوی دوزخ نهادید روی&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;سپر دید دلها به گفتار اوی&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;نباشم بدین محضر اندر گوا&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;نه هرگز براندیشم از پادشا&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=b&gt;
&lt;DIV class=m1&gt;
&lt;P&gt;خروشید و برجست لرزان ز جای&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=m2&gt;
&lt;P&gt;بدرید و بسپرد محضر به پای&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Fri, 25 Sep 2009 23:17:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=108</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-108.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>مشکاتیان هم ما را تنها گذاشت</title>
<link>http://khazaie.blogfa.com/post-107.aspx</link>
<description>&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;IMG alt=&quot;پرویز مشکاتیان&quot; hspace=0 src=&quot;http://chahar-mezrab.persiangig.com/image/003/meshkatian2.gif&quot; align=left border=0&gt;به راستی نمی دانم چه بنویسم. تنها اینکه روحش شاد باد که هست. یگانه ای بود که نظیرش نخواهد آمد.&lt;/SPAN&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;بارها و بارها با شنیدن ماهور و نوا و دستان و بیداد و آستان جانان بر سر شوق آمده ام. &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;خدایش بیامرزاد.&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: x-large&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;SPAN style=&quot;COLOR: #339966&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;یــاران مــوافق همــــه از دســت شـدنـد &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: x-large&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;SPAN style=&quot;COLOR: #339966&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;در پـای اجـل یـکان یـکان پســت شـدنـد&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: x-large&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;SPAN style=&quot;COLOR: #339966&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;خوردیـم ز یـک شــراب در مجـلس عـمر&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: center&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: x-large&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;COLOR: #339966&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;یـک دور ز مـا پیشتــرک مســت شـدنـد&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;&lt;/SPAN&gt;</description>
<pubDate>Mon, 21 Sep 2009 21:12:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=khazaie&amp;postid=107</comments>
<dc:creator>khazaie</dc:creator>
<guid>http://khazaie.blogfa.com/post-107.aspx</guid>
</item>
</channel>
</rss>
